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आरटीआई से खुलासा या बड़ा फर्जीवाड़ा? सरकारी नौकरी में दस्तावेजों की विसंगतियों पर उठे सवाल

  • RTI क्लब की उपाध्यक्ष रीटा सूरी ने लगाए गंभीर आरोप,
  • नगर निगम की सत्यापन प्रक्रिया और अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल

देहरादून। राजधानी देहरादून में कथित रूप से फर्जी दस्तावेजों के आधार पर सरकारी नौकरी और अन्य सरकारी लाभ हासिल करने का मामला सामने आने के बाद प्रशासनिक तंत्र और नगर निगम की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो गए हैं। मंगलवार को आरटीआई क्लब की उपाध्यक्ष रीटा सूरी ने प्रेस वार्ता आयोजित कर सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत प्राप्त दस्तावेजों के आधार पर कई गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने दावा किया कि उपलब्ध अभिलेखों में ऐसी विसंगतियां सामने आई हैं, जो प्रथम दृष्टया दस्तावेजों की विश्वसनीयता और सत्यापन प्रक्रिया पर संदेह पैदा करती हैं।

रीटा सूरी ने कहा कि यदि दस्तावेजों में दर्ज जानकारियों की निष्पक्ष जांच कराई जाए तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आ सकते हैं। उन्होंने पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच कराने और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की मांग की है।

जन्मतिथियों में विसंगति को लेकर उठाए सवाल

प्रेस वार्ता के दौरान रीटा सूरी ने एक ही परिवार के बच्चों की जन्मतिथियों को लेकर गंभीर सवाल उठाए। उनके अनुसार आरटीआई के माध्यम से प्राप्त दस्तावेजों में दूसरी पुत्री रेनू का जन्म वर्ष 1987 दर्ज है, जबकि तीसरी पुत्री सपना की जन्मतिथि 1 जनवरी 1988 अंकित दिखाई गई है। उन्होंने दावा किया कि दोनों जन्मतिथियों के बीच महज पांच से सात महीने का अंतर दर्शाया गया है, जो सामान्य परिस्थितियों में संभव नहीं है।

रीटा सूरी का कहना है कि यदि दस्तावेजों में यह जानकारी सही दर्ज है तो यह एक गंभीर विसंगति है और यदि जानकारी गलत है तो यह सरकारी अभिलेखों में त्रुटि या फर्जीवाड़े की ओर संकेत करती है। उन्होंने मांग की कि संबंधित दस्तावेजों की फोरेंसिक और प्रशासनिक स्तर पर जांच कराई जानी चाहिए।

मृतक आश्रित नौकरी में जन्मतिथि को लेकर भी आरोप

मामले में चौथी पुत्री बरखा को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए गए हैं। आरटीआई क्लब का दावा है कि नगर निगम देहरादून में मृतक आश्रित के आधार पर नौकरी प्राप्त करने के लिए अलग-अलग दस्तावेजों में भिन्न-भिन्न जन्मतिथियों का इस्तेमाल किया गया।

प्रेस वार्ता में कहा गया कि शैक्षणिक अभिलेखों, पहचान पत्रों और अन्य दस्तावेजों में जन्मतिथि अलग-अलग दर्ज होने के बावजूद नियुक्ति प्रक्रिया पूरी हो गई। यदि यह तथ्य सही पाए जाते हैं तो यह केवल दस्तावेजों की विसंगति का मामला नहीं होगा, बल्कि सरकारी नियुक्तियों में सत्यापन प्रक्रिया की गंभीर खामियों को भी उजागर करेगा।

नगर निगम की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल

रीटा सूरी ने कहा कि किसी भी सरकारी नियुक्ति से पहले अभ्यर्थी के दस्तावेजों का गहन सत्यापन किया जाता है। ऐसे में यदि दस्तावेजों में स्पष्ट विरोधाभास मौजूद थे तो संबंधित अधिकारियों ने उन्हें कैसे नजरअंदाज कर दिया।

उन्होंने सवाल उठाया कि क्या नियुक्ति प्रक्रिया के दौरान दस्तावेजों की सही तरीके से जांच नहीं की गई या फिर जानबूझकर अनदेखी की गई। उनका कहना है कि इस पूरे मामले में नगर निगम के जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए।

चरित्र सत्यापन करने वाले जनप्रतिनिधि की भूमिका भी जांच के दायरे में

आरटीआई क्लब ने मामले में एक स्थानीय पार्षद की भूमिका पर भी सवाल खड़े किए हैं। आरोप है कि परिवार के सदस्यों से संबंधित चरित्र प्रमाण पत्र अथवा चरित्र सत्यापन दस्तावेजों को संबंधित जनप्रतिनिधि द्वारा प्रमाणित किया गया था।

रीटा सूरी का कहना है कि जब दस्तावेजों में कई प्रकार की विसंगतियां सामने आ रही हैं तो चरित्र सत्यापन करने वाले जनप्रतिनिधि की भूमिका की भी निष्पक्ष जांच होना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि यह स्पष्ट होना चाहिए कि सत्यापन किन दस्तावेजों और किन तथ्यों के आधार पर किया गया था।

आरटीआई से मिले दस्तावेजों का दावा

प्रेस वार्ता के दौरान रीटा सूरी ने स्पष्ट किया कि जिन दस्तावेजों के आधार पर आरोप लगाए जा रहे हैं, वे सभी सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत नगर निगम देहरादून से प्राप्त किए गए हैं। उनका कहना है कि यह कोई निजी या अप्रमाणित दस्तावेज नहीं हैं, बल्कि संबंधित विभाग द्वारा उपलब्ध कराए गए आधिकारिक अभिलेख हैं।

उन्होंने कहा कि यदि सरकारी रिकॉर्ड में ही इस प्रकार की विसंगतियां मौजूद हैं तो यह प्रशासनिक व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय है।

अभी आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं

हालांकि, अब तक इन आरोपों की स्वतंत्र या आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। मामले में जिन व्यक्तियों और अधिकारियों पर सवाल उठाए गए हैं, उनका पक्ष सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया है। प्रशासन या नगर निगम की ओर से भी इस संबंध में कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया जारी नहीं की गई है।

ऐसे में पूरे मामले की वास्तविकता निष्पक्ष जांच के बाद ही सामने आ सकेगी। फिलहाल आरटीआई क्लब द्वारा उठाए गए सवालों ने सरकारी नियुक्तियों में दस्तावेज सत्यापन की प्रक्रिया और प्रशासनिक जवाबदेही को लेकर नई बहस छेड़ दी है। यदि आरोप सही साबित होते हैं तो यह मामला केवल दस्तावेजी अनियमितता तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सरकारी व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही से जुड़ा एक बड़ा मुद्दा बन सकता है।

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