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नशे की गिरफ्त में नई पीढ़ी

समाज के पतन की सबसे भयावह तस्वीर तब सामने आती है, जब मासूम बचपन अपराध और नशे के बोझ तले दबने लगे। सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि बच्चे को इस दलदल में धकेलने वाला उसका अपना जानकर ,दोस्त ही होता है। जब रिश्ते ही संरक्षण की जगह विनाश का माध्यम बनने लगें, तब यह समझ लेना चाहिए कि खतरा केवल कानून व्यवस्था तक सीमित नहीं रहा, बल्कि समाज की आत्मा तक पहुंच चुका है।
आज नशे का नेटवर्क इतनी गहराई तक फैल चुका है कि इसके तंतु हर वर्ग में दिखाई देने लगे हैं। कहीं महिलाएं, कहीं युवा, कहीं सरकारी कर्मचारी और कहीं प्रभावशाली लोग इस अवैध कारोबार से जुड़ते नजर आते हैं। अब बच्चों को ढाल बनाकर नशे की खेप पहुंचाई जा रही है, क्योंकि अपराधियों को मालूम है कि मासूम चेहरों पर संदेह कम होता है। यह स्थिति किसी संगठित अपराध तंत्र की ओर इशारा करती है, जो समाज की कमजोरियों का फायदा उठाकर अपनी जड़ें मजबूत कर रहा है।
उत्तराखण्ड जैसे शांत और पर्यटन आधारित राज्य के लिए यह खतरा और भी गंभीर है। पर्यटक सीजन के दौरान बाहरी गतिविधियों के साथ नशे और अन्य अपराधों का प्रवेश भी बढ़ जाता है। ऐसे में केवल पुलिस कार्रवाई पर्याप्त नहीं होगी। सीमावर्ती क्षेत्रों में कड़ी निगरानी, नियमित चेकिंग, डे-नाइट पेट्रोलिंग और विशेष टास्क फोर्स की आवश्यकता है। राज्य के प्रवेश द्वारों और प्रमुख पर्यटन स्थलों पर सख्त निगरानी व्यवस्था समय की मांग बन चुकी है।
लेकिन केवल प्रशासन के भरोसे इस लड़ाई को नहीं जीता जा सकता। परिवार, समाज और शिक्षण संस्थानों की जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी है। बच्चों के व्यवहार में बदलाव, गलत संगति और संदिग्ध गतिविधियों को नजरअंदाज करना आने वाले बड़े संकट को जन्म दे सकता है। समाज को यह समझना होगा कि नशा केवल व्यक्ति को नहीं, बल्कि पूरे भविष्य को खोखला करता है।
जरूरत इस बात की है कि हम समय रहते चेत जाएं। अगर मासूम कंधों पर नशे का बोझ बढ़ता रहा, तो आने वाली पीढ़ियां अपराध और अंधकार के ऐसे दलदल में फंस जाएंगी, जहां से लौटना बेहद कठिन होगा।

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